बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!
आँखों से शुरू होकर
दिल तक पहुँचती है,
फिर दिल पे
अपना कब्ज़ा-सा जमा लेती है।
पहले अपने काबू में करती है,
और फिर बेकाबू-सा बना देती है।
ये पता ही नहीं चलता
कि कौन अच्छा है..
जो इसके साथ है
या जिसने इससे दूरी बना रखी है।
बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!
इसके आगोश में आके
फिर निकलना मुश्किल,
गिरना तो आसान इसमें..
पर संभलना मुश्किल।
दस्तूर-ए-इश्क ऐसा है,
कह गया ग़ालिब..
डूबना इसमें आसान,
पर डूबकर निकलना मुश्किल।
जब तक इसमें ना डूबे
कुछ पता नहीं चलता,
मानो ये दरिया-ए-इश्क
किसी ने ढक्कन से ढक्की है।
बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!


