जो तोल-मोल कर खर्चता था अपनी हर बात,
जिसे महसूस होते थे दुनिया भर के जज़्बात,
जिससे किसी की कोई अनबन नहीं थी,
जिसकी छुअन में कोई चुभन नहीं थी।
जिसे महसूस होते थे दुनिया भर के जज़्बात,
जिससे किसी की कोई अनबन नहीं थी,
जिसकी छुअन में कोई चुभन नहीं थी।
वो इंसान अब धीरे-धीरे बदलने लगा है,
अपनों का साथ भी परायों सा लगने लगा है,
जो नहीं था उसके अंदर, वो ज़हर उगलने लगा है,
अजीब-सी नफ़रत महसूस करने लगा है।
हवा दे इस नफ़रत की आग को, या इसे बुझाए?
उगलता रहे इस ज़हर को, या ख़ुद निगल जाए?
यूँ ही चलती रही ज़िंदगी, तो शायद ही उबर पाए..
डर बस ये है, कहीं पूरी तरह जानवर ना बन जाए।
