Friday, 16 October 2015

वो इश्क़ के शोले नहीं थे, बस धुआँ था शायद।


इश्क के शोले

वो इश्क़ के शोले नहीं थे..
बस धुआँ था शायद।
तुम बदल गए..
कभी तुम्हें भी प्यार हुआ था शायद।

कभी तुम ही कहती थी,
“तुम नहीं होते तो बहुत याद आते हो..”
अब जब मैं आदी हो गया हूँ तेरा,
तो तुम मुँह बनाते हो।

कभी तुम कहती थी,
“मैं तुम्हें कभी छोड़ने वाली नहीं।”
और अब हमेशा साथ रहने की बात पे
कहती हो.. “पता नहीं।”

मेरा प्यार ही
तेरे दिल से कुछ अनछुआ था शायद..
वो इश्क़ के शोले नहीं थे,
बस धुआँ था शायद।

तुम बदल गए..
कभी तुम्हें भी प्यार हुआ था शायद।

कभी तुम ही कहती थी,
“तुमसे बात किए बिना सुबह अच्छी नहीं लगती..”
और अब तुम्हें
मेरा बोला गया कोई लफ़्ज़ सच्चा नहीं लगता।

कभी तुम कहती थी,
“तुमसे बात करके नींद अच्छी आती है..”
और अब तुझसे बात के इंतज़ार में
मेरी रात गुज़र जाती है।

मैं अच्छा नहीं..
हमेशा से ही बुरा था शायद।
वो इश्क़ के शोले नहीं थे,
बस धुआँ था शायद।

तुम बदल गए..
कभी तुम्हें भी प्यार हुआ था शायद।

कभी तुम ही कहती थी,
“जितना मैं करता हूँ,
तुम उससे भी ज़्यादा मुझसे प्यार करती हो..”
और अब तुम्हें मुझसे प्यार है,
ये कहना भी गवारा नहीं।

कभी तुम कहती थी,
“तुमसे हर छोटी-छोटी बात बताना अच्छा लगता है..”
और अब ना जाने क्यों
तुम्हें मुझसे हर बात छुपाना पड़ता है।

हार गया मैं..
कोई बाज़ी-ए-जुआ था शायद।
वो इश्क़ के शोले नहीं थे,
बस धुआँ था शायद।

तुम बदल गए..
कभी तुम्हें भी प्यार हुआ था शायद।

Friday, 15 May 2015

मैं फूल तू बागीचा..



तेरे दिल के बागीचे में,
वहीं पे कहीं हाँ नीचे में..

मैं गिर गया,
गिर के सूख गया।

कोई नया खिला,
जिसपे तेरा रुख गया।

मैं फूल था,
तू ज़मीन-ए-बागीचा।
मुझे भी था..
तुमने प्यार से सींचा।

मेरा नसीब था
गिर के तुझमें खो जाना,
तेरे नसीब में फूल ही फूल..
एक को छोड़
दूसरे का हो जाना।

Friday, 8 May 2015

थोड़ी नौटंकी, थोड़ी पागल-सी थी



वो थोड़ी नौटंकी,
थोड़ी पागल-सी थी..
बिन बारिशों वाले
बादल-सी थी।

करने को पास उसके
बहुत बातें होती थीं,
पर उसकी बातें
कभी बोरिंग नहीं होती थीं।

वो गाने बहुत बेसुरा गाती थी,
पर मुझे बहुत पसंद आती थी।

वो दिखने में कोई हूर नहीं थी,
पर उसके सिवा
मुझे कोई और सुरूर नहीं थी। 

मेरे नाम की झूठी कसमें खाती थी,
पर मेरे दिल को
सच्ची ही नज़र आती थी।

कहती थी,
“इश्क़ बहुत है मुझे तुझसे।”
फिर एक दिन कहा कि..
“दूर रहो मुझसे।”

Friday, 1 May 2015

क्या तुम वही हो?



कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?

तुम्हें तो मेरी खुशियों की
परवाह होती थी,
फिर क्यों मेरी सारी खुशियाँ
लेके चली गई हो?

तुम्हें तो मुझसे
बहुत सारा प्यार था,
फिर क्यों ये बनावटी
नफ़रत दिखा रही हो?

मेरे ना होने पे
तुम्हें मेरी याद आती थी,
फिर अब क्यों
भूलती-सी जा रही हो?

कोई बात दिल को लग गई हो
तो बयाँ करो,
यूँ खामखा की ख़ामोशी से
क्यों तड़पा रही हो?

कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?