Friday, 15 May 2015
Friday, 8 May 2015
थोड़ी नौटंकी, थोड़ी पागल-सी थी
वो थोड़ी नौटंकी,
थोड़ी पागल-सी थी..
बिन बारिशों वाले
बादल-सी थी।
करने को पास उसके
बहुत बातें होती थीं,
पर उसकी बातें
कभी बोरिंग नहीं होती थीं।
वो गाने बहुत बेसुरा गाती थी,
पर मुझे बहुत पसंद आती थी।
वो दिखने में कोई हूर नहीं थी,
पर उसके सिवा
मुझे कोई और सुरूर नहीं थी।
मेरे नाम की झूठी कसमें खाती थी,
पर मेरे दिल को
सच्ची ही नज़र आती थी।
कहती थी,
“इश्क़ बहुत है मुझे तुझसे।”
फिर एक दिन कहा कि..
“दूर रहो मुझसे।”
Friday, 1 May 2015
क्या तुम वही हो?
कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?
क्या तुम वही हो?
तुम्हें तो मेरी खुशियों की
परवाह होती थी,
फिर क्यों मेरी सारी खुशियाँ
लेके चली गई हो?
तुम्हें तो मुझसे
बहुत सारा प्यार था,
फिर क्यों ये बनावटी
नफ़रत दिखा रही हो?
मेरे ना होने पे
तुम्हें मेरी याद आती थी,
फिर अब क्यों
भूलती-सी जा रही हो?
कोई बात दिल को लग गई हो
तो बयाँ करो,
यूँ खामखा की ख़ामोशी से
क्यों तड़पा रही हो?
कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?
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