कभी-कभी बीमार पड़ना भी
एक अजीब-सी राहत दे जाता है..
एक अजीब-सी राहत दे जाता है..
दवा से नहीं,
उस भागती हुई ज़िंदगी से राहत..
जहाँ सुबह घर से निकलते-निकलते
और रात को लौटते-लौटते
पूरा दिन कहीं रास्तों और दफ़्तर की दीवारों में खो जाता है।
चौदह घंटे..
हर रोज़ सिर्फ़ जीने की तैयारी में निकल जाते हैं,
और जीना..
वो तो जैसे टलता ही जा रहा है।
फिर एक दिन शरीर जवाब दे देता है।
बुखार आता है..
गला बैठ जाता है..
लेकिन बिस्तर पर लेटे-लेटे
दिल पहली बार थोड़ा शांत लगता है।
तब समझ आता है..
तकलीफ़ बीमारी से नहीं थी,
तकलीफ़ तो उस ज़िंदगी से थी
जिसे हम “नौकरी” कहकर हर दिन सह रहे थे।
और सबसे डरावनी बात ये है..
कि उस दिन
बीमार होने का दुख कम था,
और ऑफिस ना जाने की राहत ज़्यादा।






