Saturday, 9 May 2026

बीमारी नहीं.. नौकरी थका रही थी















कभी-कभी बीमार पड़ना भी
एक अजीब-सी राहत दे जाता है..

दवा से नहीं,
उस भागती हुई ज़िंदगी से राहत..
जहाँ सुबह घर से निकलते-निकलते
और रात को लौटते-लौटते
पूरा दिन कहीं रास्तों और दफ़्तर की दीवारों में खो जाता है।

चौदह घंटे..
हर रोज़ सिर्फ़ जीने की तैयारी में निकल जाते हैं,
और जीना..
वो तो जैसे टलता ही जा रहा है।

फिर एक दिन शरीर जवाब दे देता है।
बुखार आता है..
गला बैठ जाता है..
लेकिन बिस्तर पर लेटे-लेटे
दिल पहली बार थोड़ा शांत लगता है।

तब समझ आता है..
तकलीफ़ बीमारी से नहीं थी,
तकलीफ़ तो उस ज़िंदगी से थी
जिसे हम “नौकरी” कहकर हर दिन सह रहे थे।

और सबसे डरावनी बात ये है..
कि उस दिन
बीमार होने का दुख कम था,
और ऑफिस ना जाने की राहत ज़्यादा।

Friday, 1 September 2023

जानवर




















जो तोल-मोल कर खर्चता था अपनी हर बात,
जिसे महसूस होते थे दुनिया भर के जज़्बात,
जिससे किसी की कोई अनबन नहीं थी,
जिसकी छुअन में कोई चुभन नहीं थी।

वो इंसान अब धीरे-धीरे बदलने लगा है,
अपनों का साथ भी परायों सा लगने लगा है,
जो नहीं था उसके अंदर, वो ज़हर उगलने लगा है,
अजीब-सी नफ़रत महसूस करने लगा है।

हवा दे इस नफ़रत की आग को, या इसे बुझाए?
उगलता रहे इस ज़हर को, या ख़ुद निगल जाए?
यूँ ही चलती रही ज़िंदगी, तो शायद ही उबर पाए..
डर बस ये है, कहीं पूरी तरह जानवर ना बन जाए।

Saturday, 7 December 2019

मेरी कलम


 

मेरी ही तरह बड़ी आलसी हो गई है मेरी कलम भी,
जब भी कहता हूँ लिखो मेरे दिल के हालात,
तो कहती है..
"रंजन, फिर कभी।"

टाल-मटोल की ये आदत
इसने मुझसे ही सीखी है,
शायद इसीलिए
इसकी स्याही अब पड़ गई फीकी है।

पहले ये ऐसी नहीं थी..
खूब चलती थी
और दिल के हालात बयां करती थी।
खुश होने पर खुशियाँ
और ग़मगीन होने पर दर्द लिखती थी।

चीखती थी, चिल्लाती थी..
कभी दो पल रुक भी जाए,
तो रुककर फिर शुरू हो जाती थी।

एक दिन मैंने ही
इसके रुख को बदल दिया,
मानो जैसे मैंने
इसके भूख को बदल दिया।

दिल के हाल के बजाय
दुनिया के हालात पर इसकी तवज्जो कर दी,
इसके रुख बदलने का हर्जाना
मानो मैंने इसकी रूह खोकर दी।

चलती है ये अब भी बहुत,
करती है दुनिया-जहान की बातें..
जो बयां नहीं कर पाती है,
वो हैं बस
मेरे अंदर के हालातें।

Saturday, 3 February 2018

अभी कल हीं तो..

अभी कल हीं तो
तेरे आने की खुशियाँ मनाई थीं,

अभी कल हीं तो
तूने पहली बार “माँ” पुकारा था,

अभी कल हीं तो
तूने चलना सीखा था,

अभी कल हीं तो
तू स्कूल जाने लगी थी,

अभी कल हीं तो
तेरा कॉलेज खत्म हुआ था।

ये वक़्त कितनी जल्दी बीत गया..

अभी कल हीं तो
तेरी बारात आएगी,

अभी कल हीं तो
तू दुल्हन-सी सजाई जाएगी,

अभी कल हीं तो
तेरे सात फेरे हो जाएंगे,

अभी कल हीं तो
तेरी डोली उठाई जाएगी,

अभी कल हीं तो
तू किसी और की हो जाएगी।

Sunday, 26 November 2017

तेरे हुस्न के सुहाने से सफ़र पे हूँ..


तेरी हर अदा, तेरे हर अंदाज़..
जानने हैं मुझे तेरे सब राज़।
देखना है मुझे वो सब,
जिस-जिस पे तुझे है नाज़।

आज न कर कोई रोक-टोक,
यहाँ कोई नहीं.. मैं तेरे घर पे हूँ।
तेरे हुस्न के सुहाने से सफ़र पे हूँ,
सिर से पाँव तक जाना है.. अभी कमर पे हूँ!

ना रहें हम दोनों
एक-दूसरे से अनजाने,
दिखा दे मुझे तू
अपने सारे ख़ज़ाने।

ला, एक-एक गहना
मैं पहचान लूँ,
तेरे हाथों को
अपने हाथों में थाम लूँ।

ना रख दरमियाँ कोई बंदिश,
खोल दे सारे दरवाज़े.. मैं तेरे दर पे हूँ।
तेरे हुस्न के सुहाने से सफ़र पे हूँ,
सिर से पाँव तक जाना है.. अभी कमर पे हूँ!

Friday, 3 November 2017

फिर नींद आ गई मेरी कोशिशों को




वो रात भर यादें छूती रहीं
मेरे ज़ेहन के हर हिस्सों को,
सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।

हक़ीक़त को हौसला है अब भी,
होंगे ख़्वाब पूरे..
चमकती हैं आँखें हर मोड़ पे,
जाने किस्सा कब मुड़े।

कहानी हमारी भी
शुरू हो जाए इस बार बस,
जाने क्यों भरोसा है अब भी
मेरी ख़्वाहिशों को।

सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।

छोड़ती नहीं मेरी उम्मीदें
दामन तेरे ख़यालों का,
जैसे बंद हूँ मैं तुझमें
बे-चाभी के तालों सा।

कंक्रीट की दीवारों पे भी
तू साफ़ दिखती है,
बता क्या करूँ मैं
इन ना फूटने वाले शीशों को?

सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।

Tuesday, 24 October 2017

इश्क मधुमक्खी है!

बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!

आँखों से शुरू होकर
दिल तक पहुँचती है,
फिर दिल पे
अपना कब्ज़ा-सा जमा लेती है।

पहले अपने काबू में करती है,
और फिर बेकाबू-सा बना देती है।

ये पता ही नहीं चलता
कि कौन अच्छा है..
जो इसके साथ है
या जिसने इससे दूरी बना रखी है।

बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!

इसके आगोश में आके
फिर निकलना मुश्किल,
गिरना तो आसान इसमें..
पर संभलना मुश्किल।

दस्तूर-ए-इश्क ऐसा है,
कह गया ग़ालिब..
डूबना इसमें आसान,
पर डूबकर निकलना मुश्किल।

जब तक इसमें ना डूबे
कुछ पता नहीं चलता,
मानो ये दरिया-ए-इश्क
किसी ने ढक्कन से ढक्की है।

बहुत मीठी-सी थी..
एक बार जो मैंने चक्खी है,
डंक मारती है,
शहद उगलती है..
इश्क मधुमक्खी है!