मेरे अश्क
मेरे बस में रहते हैं,
और अक्सर ये मुझसे कहते हैं. .
बह जाऊँ या ना बहूँ?
ना बहूँ तो घुट जाऊँगा,
और बह जाऊँ
तो बेमतलब लुट जाऊँगा।
बड़ी पशोपेश में हूँ. .
क्या करूँ?
रोऊँ या चुप रहूँ?
लुट जाऊँ
या घुट जाऊँ?
ग़म के ख़ज़ाने हैं शायद
जो कभी ख़त्म नहीं होते,
और हम घुटते रहते हैं
पर नहीं रोते।
मुख़्तलिफ हैं
ग़म और खुशियों की राहें,
ग़म तो हरदम रहता है,
पर खुशियाँ आती हैं
गाहे-बगाहे।
ज़िंदगी के बेतरतीब रास्तों पे
जिए जाते हैं,
दुनिया को सुनते हैं
और खुद की ज़ुबान सिए जाते हैं।

