वो रात भर यादें छूती रहीं
मेरे ज़ेहन के हर हिस्सों को,
सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।
मेरे ज़ेहन के हर हिस्सों को,
सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।
हक़ीक़त को हौसला है अब भी,
होंगे ख़्वाब पूरे..
चमकती हैं आँखें हर मोड़ पे,
जाने किस्सा कब मुड़े।
कहानी हमारी भी
शुरू हो जाए इस बार बस,
जाने क्यों भरोसा है अब भी
मेरी ख़्वाहिशों को।
सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।
छोड़ती नहीं मेरी उम्मीदें
दामन तेरे ख़यालों का,
जैसे बंद हूँ मैं तुझमें
बे-चाभी के तालों सा।
कंक्रीट की दीवारों पे भी
तू साफ़ दिखती है,
बता क्या करूँ मैं
इन ना फूटने वाले शीशों को?
सुबह तक कोशिश की सोने की..
फिर नींद आ गई
मेरी कोशिशों को।

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-11-2017) को
ReplyDelete"हारा सरल सुभाव" (चर्चा अंक 2779)
पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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कार्तिक पूर्णिमा (गुरू नानक जयन्ती) की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'