गिरह
एक गिरह
दिल पे पड़ी,
एक विरह
दर्द-सी बढ़ी..
कुछ ग़म हुआ,
थोड़ी आँखें भरी,
उनके ही दिए रुमाल से
आँखें पोंछनी पड़ी..
रिश्तों में पड़ती
कोई नई कड़ी,
और लंबी होती
प्यार की ये लड़ी..
पर ये ना हुआ,
कोसता हूँ वो घड़ी,
जब खुशियों पे
किसी की बुरी नज़र पड़ी..
एक गिरह
दिल पे पड़ी,
एक विरह
दर्द-सी बढ़ी..
दिल की गिरह खोल दो चुप न बैठो ,,,,,
ReplyDeleteRECENT POST...: राजनीति,तेरे रूप अनेक,...
ये गिरह ,परत दर परत नए एहसास समेटे हुए हैं..उम्दा
ReplyDeleteसटीक प्रस्तुति ||
ReplyDeleteबहुत सार्थक प्रस्तुति।
ReplyDeleteगिरह खोलने पे दर्द कम हो जाता है ... मुक्त कर दो उसे ...
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