Saturday, 14 July 2012

गिरह


एक गिरह
दिल पे पड़ी,
एक विरह
दर्द-सी बढ़ी..

कुछ ग़म हुआ,
थोड़ी आँखें भरी,
उनके ही दिए रुमाल से
आँखें पोंछनी पड़ी..

रिश्तों में पड़ती
कोई नई कड़ी,
और लंबी होती
प्यार की ये लड़ी..

पर ये ना हुआ,
कोसता हूँ वो घड़ी,
जब खुशियों पे
किसी की बुरी नज़र पड़ी..

एक गिरह
दिल पे पड़ी,
एक विरह
दर्द-सी बढ़ी..

5 comments:

  1. ये गिरह ,परत दर परत नए एहसास समेटे हुए हैं..उम्दा

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  2. सटीक प्रस्तुति ||

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  3. गिरह खोलने पे दर्द कम हो जाता है ... मुक्त कर दो उसे ...

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