Friday, 8 May 2015

थोड़ी नौटंकी, थोड़ी पागल-सी थी



वो थोड़ी नौटंकी,
थोड़ी पागल-सी थी..
बिन बारिशों वाले
बादल-सी थी।

करने को पास उसके
बहुत बातें होती थीं,
पर उसकी बातें
कभी बोरिंग नहीं होती थीं।

वो गाने बहुत बेसुरा गाती थी,
पर मुझे बहुत पसंद आती थी।

वो दिखने में कोई हूर नहीं थी,
पर उसके सिवा
मुझे कोई और सुरूर नहीं थी। 

मेरे नाम की झूठी कसमें खाती थी,
पर मेरे दिल को
सच्ची ही नज़र आती थी।

कहती थी,
“इश्क़ बहुत है मुझे तुझसे।”
फिर एक दिन कहा कि..
“दूर रहो मुझसे।”

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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