कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?
क्या तुम वही हो?
तुम्हें तो मेरी खुशियों की
परवाह होती थी,
फिर क्यों मेरी सारी खुशियाँ
लेके चली गई हो?
तुम्हें तो मुझसे
बहुत सारा प्यार था,
फिर क्यों ये बनावटी
नफ़रत दिखा रही हो?
मेरे ना होने पे
तुम्हें मेरी याद आती थी,
फिर अब क्यों
भूलती-सी जा रही हो?
कोई बात दिल को लग गई हो
तो बयाँ करो,
यूँ खामखा की ख़ामोशी से
क्यों तड़पा रही हो?
कभी-कभी खुद से पूछता हूँ..
क्या तुम वही हो?

प्रेम में होता है कई बार ऐसा ... पर रूठे मान भी जाते हैं ...
ReplyDeleteसुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
ReplyDeleteशुभकामनाएँ।
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
प्रेम का यही रूप तो वास्तविक प्रेम कहलाता है
ReplyDeleteवाह बहुत खूब
बहुत ही सार्थक रचना।
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